आस्था और कर्तव्य का संगम: मेरा संकल्प

April 2, 2022

पवित्र नदी के तट पर खड़े होकर, बहती हुई जलधारा मुझे निरंतर आगे बढ़ने और बिना किसी भेदभाव के सबको जीवन देने की प्रेरणा देती है। भारतीय सेना में रहते हुए मैंने इस देश की मिट्टी की रक्षा के लिए शस्त्र उठाए थे, और आज उसी पवित्र मिट्टी और उसकी संस्कृति के समक्ष नतमस्तक होकर मैं समाज सेवा का आशीर्वाद मांग रहा हूँ। यह प्रार्थना मेरे व्यक्तिगत सुख के लिए नहीं, बल्कि उस ‘नवभारत’ के उदय के लिए है, जहाँ हर व्यक्ति का जीवन गरिमामय हो और हमारा देश अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़कर विकास की नई ऊंचाइयों को छुए।

प्रकृति से प्रेरणा, राष्ट्र की सेवा।

ईश्वर और प्रकृति को साक्षी मानकर, मैंने यह संकल्प लिया है कि मेरे जीवन का शेष समय मानवता के उत्थान के लिए समर्पित रहेगा। ‘नवभारत चेतना संस्थान’ के माध्यम से हम समाज के वंचित वर्ग की पीड़ा को हरने का प्रयास कर रहे हैं। मेरे लिए ‘नर सेवा ही नारायण सेवा’ है। माँ गंगा (या पवित्र नदी) की शीतलता मेरे इरादों को और मजबूत करती है कि हमें मिलकर एक ऐसे समर्थ और समृद्ध भारत का निर्माण करना है, जहाँ कोई भूखा न सोए और ज्ञान का प्रकाश हर घर तक पहुँचे।