मेरे लिए यह महज एक तस्वीर नहीं, बल्कि वह अनमोल पूँजी है जो मैंने जीवन भर कमाई है। जब समाज की कोई बुजुर्ग माँ अपने आशीर्वाद रूपी हाथों से मेरे माथे पर तिलक लगाती है, तो मुझे वही अपनापन महसूस होता है जो सरहद पर भारत माता की रक्षा करते समय होता था। सेना की वर्दी उतरने के बाद, इन माताओं का स्नेह और विश्वास ही मेरा सबसे बड़ा पदक (Medal) है। यह तिलक मुझे याद दिलाता है कि मेरा ‘मिशन’ अभी पूरा नहीं हुआ है; पहले देश की सीमाओं की रक्षा की थी, अब देश के भीतर इन अपनों की खुशियों की रक्षा करनी है।

जन-जन का प्यार, यही है मेरा परिवार
यह निश्छल प्रेम और यह आत्मीयता ही ‘नवभारत चेतना संस्थान’ की नींव है। इन माताओं की आँखों में जो उम्मीद है, उसे पूरा करना ही अब मेरे जीवन का एकमात्र लक्ष्य है। यह तिलक एक जिम्मेदारी है—इस बात की कि हमारे देश का कोई भी बुजुर्ग बेसहारा न रहे और कोई भी परिवार सम्मानजनक जीवन से वंचित न हो। आपके इस आशीर्वाद को मैं अपनी ढाल बनाकर समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुँचने का संकल्प लेता हूँ।